Monday, August 14, 2017

पहचान पत्र

गौ सी
बच्चियों
के भी रक्षकों के
बनें बॉयोमीट्रिक्स पहचान पत्र
माँग है मेरी,
झाँक
पुतलियों में
सब की,
पढ़ी जाये मस्तिष्कों में
मानसिकता,
अँगूठों उंगलियों की
ले छाप
एहतियातन रखी जाये।

जश्न

आपके
जश्न
के ताप में
ठंडक
क्यों नहीं,

सुनिश्चित
कर लीजिए
आज़ाद हैं आप,
भूरे अंग्रेज़ के
ग़ुलाम तो नहीं!

तीर

कहाँ से निकला तीर
कहाँ कहाँ से हो
कहाँ जा लगा,

करे कौन
घबराई रूह से न्याय
न हुई
जिसे पुष्टि
एक युग तक,
कि उसकी सोच की देह को
कहाँ और कितना
लगा, न लगा।

दबे पाँव

यही सोचकर
निकलते हैं
दबे पाँव
उतार मन्शा की जूती
ओढ़ गुमशूदगी का कम्बल,
गली से आपकी
बेक़सूर
बूढ़े
मजबूर
लफ़्ज़
रात के पिछले पहर,

कहीं पड़ गई जो
आपकी
निरुक्ति भरी नज़र
तो पूरी
कहानी जायेगी।

एहसान

इतना न ले
दिल पर
अंधेरी रात का
एहसान
ऐ चाँद,
कि दब कर
फीका तारा हो जाये,
इसी गर्ज़ से
फैली थी
स्याही
कि तेरे पैग़ाम में
कुछ चमक आये!

Saturday, August 12, 2017

कोहिनूर

चूमने को मिट्टी
बेताब था
कोहिनूर,

ज़िद पर अड़ा था
फिर किसी दौर का शाहजहाँ
उठाए सर पर
ताज महल सा मक़बरा!

द्वारपाल

नतमस्तक है
शस्त्र
मिला जिसे अवसर
होने को द्वारपाल
व्यवस्था के
उस महल का
जिसमें
बसता था
धर्म का
आश्वासन,
प्रेम का
ब्रह्माण्ड।

Friday, August 11, 2017

रंगमंच

छोटू,
सीधा हो कर बैठ
वो सामने
उस कैमरे के पीछे
भगवान है,

ला मुस्कुराहट
चेहरे पर अपने,
न लगे उसे
कि हम
उससे
नाराज़ हैं...

पूछे,
तो कहना
हम
उसके रंगमंच के हैं
बाल कलाकार,
उसकी
सलाम बॉम्बे
स्लमडॉग का
इंतज़ार है!

बस

मस्तिष्क
अभी भी था
हवाई जहाज़ों
रॉकेटों
की होड़ में,

एक देह थी
जिसकी
बस थी
हो चुकी...

रोटियाँ

कुत्तों की क़िस्मत को
सलामत हैं
न जाने कितने
मालिक,
उनकी रोज़ी
रोटी
रोटियों को पकाने और खाने वाले परिवार,
बची रोटियों की बरकतें
बची रोटियाँ रखने को डयोढियाँ,
डयोढियों को छाँव देती छतें,
छतों को सलामत रखती
कुत्तों की आस की
दीवारें!