Tuesday, October 3, 2017

हरे ज़ख़्म

कहीं
अभी भी होंगे
मुझमें
ज़रूर
कुछ हरे ज़ख़्म
जो मेरी निगाह में नहीं,

बहती है जो
बात बात पर
मेरी सोच में
इतनी मवाद
जो नीयत ए ख़ैर ख़्वाह
में नहीं...

गाँधी

जब भी दिखता है गाँधी
कभी बेन किंग्स्ले
कभी गोडसे
कभी पटेल नेहरु बोस
कभी अम्बेडकर
दिखता है,

भरा है विषाक्त विरोध से
किस क़दर मेरा ज़हन,
दिखता नहीं
हाड मास के निश्चय का निडर हौसला
जो बार बार
मेरी ही दरारों में कहीं छिपता है!

ਅਫਸੋਸ

ਕੈਮਰੇ ਨੂੰ
ਅਫਸੋਸ ਏ
ਕਿ ਓਹਦੀ
ਸਿਰਫ਼ ਅੱਖਾਂ ਨੇਂ,
ਹੱਥ ਪੈਰ
ਤੇ ਖ਼ੁਦਮੁਖਤਾਰੀ ਦੀ
ਕੁਅਵਤ ਨਹੀਂ,

ਕਿਸ ਕਿਸ ਦੀ
ਨਈਂ ਤਾਂ
ਕੀ ਕੀ ਤਸਵੀਰ ਵਖਾਉਂਦਾ
ਮੁਖੌਟੇਆਂ ਤੋਂ ਓਹਲੇ ਓਹਲੇ।

सफ़र

ख़ुद ही
झुक कर
पहाड़ नें
पीठ पर
बैठाया नहीं होगा,

कुछ तो
रहा होगा
उस शक़्स का सफ़र,
यूँ ही तो
इस मुक़ाम पर
आया नहीं होगा!

पगड़ी

शुक्र है
ख़ुद ही
उतार दी
कुकर्म से पहले
पगड़ी
उसने,

उसके मुखौटे
को
अभी तक थी शर्म,
न थी
बची
जिसमे!

ख़ाली हाथ

होटल के रेस्टोरेंट की दीवार पर लगी तस्वीर को दिखा हाथ में ट्रे उठाये उठाये शर्माजी बोले

"ये विख्यात प्राचीन देव कामरुनाग मंदिर है...और ये उस मंदिर की झील

बहुत ऊँचाई पर स्थित हैं ये..."

फिर खिड़की की तरफ़ इशारा कर बोले...."वो, वहाँ उस पहाड़ की चोटी पर हैं ये मंदिर और झील.

कुछ नज़दीक तक सड़क है जहाँ तक गाड़ी जाती है...फिर कुछ मील पैदल चलना पड़ता है...

यहाँ तक आए हैं तो वहाँ भी हो कर आयें!

बड़ी महानता है इस मंदिर की

और इस झील के बारे में एक बड़ी अविश्वसनीय किंवदंती है..."

हमारे खुले मुँह और प्रश्नों से उमड़ती आँखों को देख शर्मा जी ने बताना जारी रखा...

"कहते हैं इस झील में टनों सोना चाँदी पड़ी है!"

"दर असल मन्नत माँगते समय श्रद्धालु जो भी क़ीमती आभूषण सोना चाँदी अर्पण करने का प्रण करता है, मन्नत पूरी होने पर वो वही वही आकर उस झील में धन्यवाद सरीखे झील में भेंट चढ़ा देता है।"

"सैंकड़ों वर्षों से सोना चाँदी आभूषण सब इसके अंदर ही पड़े हैं। कभी निकाले नहीं गए!"

शर्मा जी चुप हो गए और गूँजता सन्नाटा छा गया।

फिर अनायास मेरे मुँह से निकल गया

"आप तो, शर्माजी, कई बार गए होंगे वहाँ!"

शर्माजी मुस्कुराए और धीरे से बोले

"नहीं!"

सभी सम्मोहित मानसों के सन्नाटे एक ही स्वर में हैरानगी में अनायास टूट पड़े

"क्यों!!!"

शर्माजी कुछ क्षण मौन रहे, फिर मंद मंद मुस्काये और दबी आवाज़ में जाने किस से बोले

"भीतर ही देख लिया था जब मंदिर देव कामरूनाग का तो एक रोज़ स्थिर चित्त वाली समर्पण की झील में पदार्थवाद का हर आभूषण मैंने बहुत पहले ही था भेंट कर दिया। फिर ख़ाली हाथ कैसे जाता!"

कोलाहल

यूँ ही गए
दूर कोसों
बचने कोलाहल से,

सिर्फ़ टीवी का मुँह था
बंद करना
या अपने ज़हन के कान!

अकेला

कोई लेना देना नहीं
जंगल के फूलों को
अर्थव्यवस्था से तुम्हारी

न कोई सरोकार
इन परिंदों को तुमसे
मुबारक तुम्हें व्यस्तता की ख़ुमारी,

हवायें ख़ुश हैं आसमानों में अपने
ततीमों में बटी
बस ज़मीनें तुम्हारी,

हैं सन्नाटे ये बधिर
शोर ओ गुल से तुम्हारे
कुछ और गुनगुनाने की है इनकी तैयारी,

अपने ही उजाले में रहकर सारा दिन गुम
अकेला है इस कदर शाम का सूरज
कि चाँद की गोद में है रोने की बारी

बहाने

मिट्टी को रुलाने के
बहाने ढूँढ लिए,

अय्यार हवाओं को आता था
दम भरना भी बुझाना भी!

Saturday, September 23, 2017

ਪੀੜ

ਜੋ
ਮੰਗਿਆ ਸੀ ਤੂੰ
ਓਹੀ ਦੇਣ ਲੱਗੇਆਂ,

ਸਹ ਲੈ
ਥੋੜੀ ਪੀੜ
ਤੇਰਾ
ਕੰਡਾ ਕੱਢਣ ਲੱਗੇਆਂ!