Wednesday, June 28, 2017

तरस

कहाँ ढूँढता हूँ
मैं
अब
तुझे
तेरे दर पे,

जब से
आ बसा है तू,
मेरे मन में
तरस कर के...

वज़ीर

वज़ीर ख़ान
तू व्यर्थ ही
नर्क गया,

सिक्खी के
साहबज़ादे ही
आज
चुनवाने को हैं
गुरु की बात
उसी के द्वार...

आत्मकथा

दस मिनट में
वो शख़्स
अपनी
अनलिखी
आत्मकथा के
अंश सुना गया,

छोड़ गया मुझे
लटकता
कौतुहल की रस्सी से
प्रश्नों के पेड़ पर
उल्टा,
मजबूर,
करने को पूरी
कथा वो उसकी
कहानी से अपनी...

पहचान

जितने भी ईश्वर
तेरी पहचान में हैं,
आज सब को बुला ले,

तेरे वजूद
का है
यज्ञ
कर आह्वान
सारे अपने
बुला ले...

Tuesday, June 27, 2017

मेवे

सूख सूख के
मेवे हो गए हैं
भीतर ही भीतर
साल दर साल
परतों में दबते
वो सारे अधूरे अरमान
भावनायें
अनकहे विचार
आत्म मन्थन के विष अमृत...

जब भी लगती है
प्रेरणा की भूख
बीनता हूँ
बिसरा कुछ,
खा लेता हूँ!

Monday, June 26, 2017

शीत युग

समझ रही है
दुनिया
जिसे
तेरे शीत युग की शुरुआत
देख तेरी जटाओं की
सफ़ेदी,

है दर असल
एक जीवन पर्यंत
शीत युद्ध का अंत
बसंत का आगमन।

चोला

मैले
घिसे
बदनसीब
चोले को जब
धोना
सवारना
करना रफ़ू
मुमकिन न रहा,

मुनासिब समझा
रूह ए सफ़र ने
चोला बदलना।

गर्जना

बरसने आया था वो
जिसे हवाओं ने
खदेड़ दिया,

उसकी मजबूरी थी
उसकी गर्जना,
भयभीत सेहरा ने
न जाने क्या समझ लिया!

Thursday, June 22, 2017

मवेशी

खपरैलों की छतों तले
पक्के हौसले वाली कच्ची दीवारों से सटी
आसमानी नाको की एक गली में छुप
कतार के अनुशासन में खड़े थे
बिन खूँटे बिन रस्सियाँ
बिन चारा बिन पानी
चमड़े की काठी पहने
लोहे के मवेशियों से
थके मगर अभी भी जोश से भरे
निराली नस्ल के
अभी भी भभकते गर्म
वो
प्रवासी
रॉयल एनफ़ील्ड!

हादसे

कब तक
याद रखूँ
हादसे अपने?

और क्यों?

न होता बचना
तो ख़ुदा
बचाता क्यों!

Tuesday, June 20, 2017

पुष्प

प्रशस्ति पत्र के लिए
खड़े देखे जब कतारों में
करबद्ध
लिए हाथों में पात्रता की अर्ज़ियाँ
पदम् की चाह में
इत्र से महकते पुष्प,

तितली होने पर
आज
मलाल आया!

Monday, June 19, 2017

इफ़्तार

गृह युद्ध
न जाने
कितना और चले,

चलो
बीच ही
रुक
करें अदा
शुक्रिया उस का
उस बात का
समझाने हमें
जतन वो नाकाम करे,

गृह युद्ध
न जाने
कितने और चलें,
आओ बच्चो
बिन वालदेहन
इफ़्तार चलें।

Sunday, June 18, 2017

छलावा

किसी गम्भीर तलाश में है दुनिया
ये आत्म छलावा रहने दे,
ख़ुदा हासिल है जब
कदम कदम पर
और दर किनार है,
कहती रहे अब जो भी दुनिया
उसे कहने दे...

कालचक्कर

जदों वी जाइदै
कलकत्ता
मद्रास
बम्बे
थोड़ा पंजाब
नाल लै जाइदै,

खाईदै कड कड
अचार दे डब्बे चों
सुक्की रोटी दे नाल
वेले कवेले,
कुज पैन ड्राइव च पा के
उदास दिल नूँ
कर कोशिशाँ परचाइदै,

रख लइदै नाल
इक पुराणी अख़बार पंजाबी
चन्गियाँ मन्दियाँ ओही
रोज पढ़ पढ़
भटके दिल नूँ आरे लाइदै,

नितनेम दा
रखीदै गुटका कोने च ट्रंक दे
बन्न सिर ते परना
सवेरे शाम
पढ़ दिल च वसाईदै,

चलाईदै ट्रक
अमानताँ पुचाईदै,
रिज्ज्क नूँ ला सिर मत्थे
अकाल पुरख दा शुकर मनाईदै...

"मुडाँगा कदे मैं वी
आपणे कलकत्ते आपणे बम्बे तों,
मिलेगा कदे मैनूं वी
आराम मेरे कालचक्कर तों,
मेरी अमानताँ वी मेरी झोली पैणगियाँ"
की की दब्बियाँ अरदासाँ
मन्ना! सीने च रखी दै...

प्यास

कहो तो
चुनवा दें
शहीदों को
जो बच आये हैं
हारी जंग से
आपकी,
इतने से भी
'गर
तमाशाई प्यास न बुझे आपकी
तो भटकाने
आपके भीतरी खोखलेपन से आप ही का ध्यान
बतायें मजबूर देश क्या करे...

दुश्मन

ग़ौर से देख
दुश्मन को,
कहीं तू ही तो नहीं,

दोस्त होते तुम
तो वो क्या होता!

दावे

सितारों तक
जिनकी पहुँच न थी
दिल के अम्बर तले लेट गए,

खोल दिये पिंजरे
रूहों के,
जिस्मों के दावे छोड़ दिए!

Saturday, June 17, 2017

दुनिया

कहाँ कहाँ तक है दुनिया
तुझे इल्म नहीं है,
तेरे ख़्यालों के शहर तक है
तेरे जिस्म का वजूद
हद ए रूह नहीं है!

परिंदे

आज भी हैं
कुछ जगहें
जहाँ
जन परिंदों से कम हैं,

लोहे के परों पर
उन्मुक्त हो
उड़ते हैं
नाभकीय सड़कों पर
कुछ लोग वहाँ,
बस नज़ारे चुगते हैं,

गुम जाते हैं
जादुई वादियों में
कुछ दिनों के लिए,
पर्बतों की ओट में
बिन अहम
बस आत्मा बन रहते हैं!

on
Just concluded ride to Spiti by
By dear friends
Ashish Dewett and Kanwar Aulakh

Friday, June 16, 2017

कमली

बोल सकदी ताँ चीख़ चीख़ दसदी
भन्न भन्न अड्डियाँ सारे शहर च नसदी
खिच खिच ध्यान
घुंड चुक चुक वखांदी
हंजू ख़ुशी दे डोलणे नूँ
भोरा न संगदी,

लैंदी मेरा नाँ
वखांदी मेरा पता
फड़ फड़ सुणान्दी मेरी कहाणी,
ते दसदी कित्थे चलली सी
मिल मिल विछड़दियाँ सहेलियाँ नूँ
कदे रोंदी
कदे लै लै हौके
कमली हो हो हसदी,

किन्नी खुश सी ओ
किन्नी सुदराई
मिलण दे चा च मैनूं
ओ क़िताब
जो मुल्ल भेज
हुणे हुणे
मैं सी मंगवाई!!!

रेल

न पटरी , न पहिये
न इंजन
न मन्ज़िल है
इस रेल की,
चल रही
दुनिया,
घट घट के
बढ़ रही,
रुका इंसान
कुछ यूँ
सफ़र में है...

दो हज़ार सैंतीस

दो हज़ार सैंतीस देखा आपने?
अभी अभी गुज़रा
सामने से आपके,
घोड़े पर सवार,
ख़ुश,
अभी पाँच साल का है
अपनी विरासत से अनभिज्ञ
आपकी विफलता, मजबूरियों से अनजान...

कहानी

चल
आज
तुझे
छुपाता नहीं मैं,
बता
क्या
कहानी
है तेरी...

मिट्टी

मिट्टी
ज़रूरी तो नहीं
मिटियाली रंग की हो,
क्या क्या
रंग
रूप
लेती है ले
बिना कुछ किये
देने सब हो...

Thursday, June 15, 2017

क्यों

क्यों सुनूँ
तेरी फ़रियाद
कोई आख़िरी तो नहीं,
रखा है
ख़ुद को
कितना कमज़ोर,
बस इलतजायें ही करना
मुनासिब तो नहीं।

जिस्म

चाय की गरम केतली से निकलती
भाप से लगे
हाँडी सी वादी में
उड़ते बादल,
थकी आँखों की भरी तश्तरी में
रूह के होंठों से भर चुस्की
अलसाए वजूद के जिस्म में
नई स्फूर्ति आई!

सिसकियाँ

आज
वहाँ से टूट के लौटा हूँ
जहाँ से
जुड़ के लौटती हैं
रूहें,
मेरे बिखरने में
बिछड़ी कायनात की
सिसकियाँ हैं!

पुष्प

बस यही सोचकर
मैंने तुझे
मुड़कर नहीं देखा,
कहीं हो न जायें
अल्हड़पन की तेरी पंखुड़ियाँ
घबराकर बन्द
सचेत पुष्प की तरह...

Monday, June 12, 2017

शक़

मुझे
पहले ही शक़ था, दया!
कि कुछ तो गड़बड़ है,
वो शख़्स
हमेशा क्यों वहाँ है
जहाँ दुनिया नहीं!

Saturday, June 10, 2017

राज़

कुछ तो राज़ है
इस दर्द
इस तड़प का,
कुछ तो
छुपाने में आमादा है
क़ायनात
जो ये सब दिखाती है!

इल्म

क्यों बख़्श देता है ख़ुदा
हमारे गुनाह
कुछ इल्म है मुझे आज,
दौड़ के जो लगते हैं
उसके बच्चे
गले उसके
एहसास जागने के बाद...

वजह

चिंगारियों भरी
नम आँखों से
क़ुबूल ले
गर मुस्कुराते हुए
मुमकिन नहीं,

माँग के
ली है
ये शय
तेरी नियति नें,
कोई वजह होगी।

समर्पण

सोचता तो हूँ
कि कर दूँ
किस्मत को
समर्पण,
फिर सोचता हूँ
कहीं संघर्ष ही न हो
किस्मत मेरी!

Wednesday, June 7, 2017

ठहर जा

तेरे ऊपर से
गुज़र जाएगा
वक़्त
पैर रख के,

ठहर जा
जहाँ है
ख़ुदा करके।

Friday, June 2, 2017

पते

किसी मस्जिद में
नमाज़ अदा करने को
जी करता है,

गुरु के
गुमनाम पते
ढूँढने को
जी करता है।

Tuesday, May 30, 2017

छुट्टी

कुछ दिन
छुट्टी पर चलें?

निकलें
मस्तिष्क से
फ़िज़ाओं में रहें!

बुत

देखे हैं
तुमसे बुत
अब तो
इतने,

ख़ुदा भी
मिलता है
तो काफ़िर सा
लगता है!

इंतज़ार

हूँ इंतज़ार में
उस दिन के,
(काश! कभी आये)
जब
होकर मायूस
क्रिया कलापों से अपने,
कर बन्द मारना हाथ पाँव,
बैठी देखूँगा
लगभग सारी मानवता,
अपनी अपनी छत
अपने अपने आँगन,
उठाये कौतुहल से रिस्ते सर
देखते काले टिमटिमाते आसमान की ओर
सारी सारी रात
चुपचाप
एकटक
सोचते
कि आख़िर
कौन!
क्या!
क्यों!

Monday, May 29, 2017

सबब

आई है
उन्हें
हमारी याद,

आइये
सबब ढूंढें,

करें
कुछ
जतन
उन्हें
फिर भूलें।

Sunday, May 28, 2017

बुलबुले

नभ विचरण को
गये हैं
बेक़ाबू अरमानों के बुलबुले,
होश की हक़ीक़त को
वक़्त है अभी,

लहर की झाग
बैठने में
समझता हूँ, सागर!
वक़्त है अभी!

पीछा

करते हैं जैसे
चक्रवात का पीछा
अमेरिका में
दीवाने कुछ,

वैसे ही,
यहाँ भी,
देख लेना,
भागेंगे पीछे
खोये तूफ़ानों के,
ज़ख़्मी परवाने,
उम्मीद से पुकारती शम्मायें
नासमझी की फुंकारों से
जब जायेंगी बुझ।

इंतज़ार

आदि मानव
इंतज़ार में है
कि परिष्कृत मानव
आपस में लड़ मरे
और उसे
वापस मिले
उसकी धरती,
सुख की साँस ले
कायनात,
हो इक
भयावह ख़्वाब की
इति।

Friday, May 12, 2017

बात

बनने के लिए बने
तो क्या बने,
बनते बनते बनो
तो कोई बात बने!

Tuesday, May 9, 2017

दुनिया

आती रहे
मुझ तक
उसकी आवाज़,
शक़्ल ओ सूरत
दरीचों से
गैर इरादतन
दिखती रहे,

रहे मगर
एक बाज़ू के फ़ासले पर
ये दुनिया
और बसती रहे।

पैकेज

पूछते हैं वो
कि कितने लाख का
है पैकेज,

अभी अभी
जलते देखा
एक ख़ामोश पैकेज,
सड़क किनारे
चन्दन पर,
मुफ्त का था!

Friday, April 21, 2017

दस्वन्ध

दस्वन्ध
हराम दी कमाई 'चों नहीं
हलाल दी कमाई विचों,
पैट्रोनाइज़्ड डेरेयाँ नूँ नहीं
ज़रूरत मन्दाँ नूँ,
मार्केटिंग वाँग नहीं
गिण के नहीं...

जन्नत

मोटर से ही उठा कर
ज़रा गिरा दो
ऊपर से
झरने की तरह पानी,

किसी तरह तो
उजड़ी जन्नत का
ये एहसास मिटे।

सेल्फ़ी

सेल्फ़ी ने सेल्फ़ कॉन्फ़िडेंस को
सूली पर टाँग दिया,
सही सही न हो शूट
तो जान निकल जाये।

ख़ुश

साधनों की तरह
खुशी की शर्तें भी
बड़ी कम थीं
ग़रीब के पास,

कम कोशिशों के बावजूद
वो कैसे ज़्यादा खुश था?

एमरजेंसी

भगदड़ मच जाती
फैल जाती
अफ़रा तफ़री,
भागते इधर उधर
सब लोग
बचाने जान,

निकल आते
तुरत रक्षा बल के
सशस्त्र जवान
संभालने मोर्चा
मर मिटने को तैयार,
गर न होता
ये सायरन
सरकारी कर्मचारियों की
छुट्टी का
पाँच बजे वाला हूटर,
एमरजेंसी का होता...

Wednesday, April 19, 2017

महफ़ूज़

मेरी सूरत पर थी
ज़माने की नज़र,
सीरत महफ़ूज़ थी,

तेरी खुदाई से ढकीं मैंने
बेशक़ीमती
परतें तेरे मानूस की...

आँख मिचौनी

सपनों की दुनिया
कहीं यही तो नहीं?

आँख मिचौनी खेलती
मुखौटे के पीछे तो नहीं!

भोजन

टी वी की प्लेट में
मस्तिष्क के डाइनिंग टेबल पर
आखों के हाथ
झट परोस देता है
सोशल मीडिया का
नौकर
कलेजा मूँह को लाती ख़बरें
ठीक भोजन के वक़्त...

स्वर्ग के आधे रास्ते

ज़मीन से
उसने
कोई सरोकार न रखा,
सिवाय
उस मोटे पेड़ की जड़ों का
जिसके तने पर
बनाया उसने
वो ट्री हाउस
स्वर्ग के आधे रास्ते,
लिए साथ
यक्ष के अंतिम सवाल वाला
साथी।

Saturday, April 15, 2017

तितली

दिया था
जन्म
जिस तितली को
आपने,

सूख गए हैं
अब
उसके
रंग,

फड़फड़ा अपने पंख
चाहती है
अब उड़ जाना
बन्द क़िताब से उस,


ढूँढ
खोलो
माज़ी का वही वर्क़,
कर जाओ आज़ाद...

ज़िंदा

कुछ दिन तो
रहें
पिता
ज़िंदा,
कि बच्चे के ज़हन में
ता-उम्र रहें।

गुब्बारे

उड़ने दूँ
आसमान में,
मैं चलूँ,

कब तक
बच्चों के गुब्बारों को
पेड़ का तना बन
पकड़े रखूँ!

Friday, April 7, 2017

शेल्फ़

मेरी  ग़ैर मौजूदगी में भी
मिल लेते हैं
मुझसे
घर आने वाले,

क्या क्या बता देती हैं उन्हें
मेरे बारे
मेरे कन्धों की शेल्फ़ पर पड़ी
किताबें मेरी...

टंकियाँ

उड़ती
पानी की टंकियाँ
ये रहमतों के बादल,

औंधी पड़ी
बिना पैंदे की
ये इन्सां की बाल्टियाँ...

Tuesday, April 4, 2017

ख़्याल

मत पूछ
अपने बारे में
मेरे ख़्याल,

ख़ुद की बाबत भी
बेबाक़ ओ
आला नक़ीद हूँ मैं।

Sunday, April 2, 2017

पति

उप
कुल
पतियों
की सति प्रथा पर
हतप्रभ
क्षुब्ध है
आज के हर राममोहन की रूह,
एक महाराजा की ताजपोशी
के घटनाक्रम पर
शर्मसार है
लोकतन्त्र के मत का
हर राजा।

Thursday, March 30, 2017

कतार

अभी तो
गर्मी
ठीक से
आई भी नहीं
और रूहें
पलायन को
कतार में हैं,

लू में
बिजली कटेगी
तो कैसी
भगदड़ होगी!

ख़बर

उड़ उड़ के
सरे आम
पहुँचे
गीत उसके
मुझ तक,
बीच में
किसी ने
न सुने,

नीले दाँत की
किसी को
कानों कान
ख़बर न हुई!

ज़रूरी

कभी
देह से बाहर निकल कर
सोच
कितना ज़रूरी है तू!

रूह को
कोई जानता नहीं,
यूँ देह को
कोई मानता नहीं!

कायल

दैवीय न्याय
बीच बीच में
कभी कभार
देखा तो है,
पर कायल नहीं हूँ मैं,

देखा है
उतना तो
आततायी को भी
करते तरस
अक्सर!

Wednesday, March 29, 2017

तजुर्बे

तजुर्बे
नाकाम भी होंगे
माँगेंगे कीमत भी,
पर
देना,

जो न बनी बात
तो देंगे
ज़हानत का बोसा,
जो सही बैठे
तो नए दरवाज़े खोलेंगे!

Tuesday, March 28, 2017

आग

क्या
इत्तेफ़ाक़ है ये
कि सचिवालय में
आग लगी है
जब कुछ ही दिन पहले
एक ईमानदार सरकार गिरी है?

दमकलों से कहो
कि भीगी राख़
समेटते आयें,
स्याही की कालिख़ में
आह दबी है!

कुछ अलग

चल
आज
कुछ कर के आयें,

पिक्चर
पिकनिक
क्लब
मैच छोड़,
लौंग ड्राइव भी नहीं,
मोमबत्ती पकड़
धरना दे कर आयें,

चल
आज
कुछ अलग
करके आयें।

Monday, March 27, 2017

बोटी

बोटी
मालिक
दुम,

गलियाँ
साथी
घूम,

सोये
जागे
धूम,

कुत्ते सी
ज़िन्दगी का
एक और दिन
गुम।

तारीफ़

इतनी तारीफ़ करोगे
तो बेचारा
संभलेगा कैसे?

अभी तो
नेगेटिव में चल रहे हैं
अच्छे अच्छे
तजुर्बे उसके,

न्यूट्रल से पॉज़िटिव में आयेंगे
तो सहेगा झटके कैसे?

किसे

सूरत को तेरी
या दूँ
सोच को
तरजीह,

कहाँ लगाई है
फ़ेयर एंड लवली
और ज़रूरत कहाँ है!

Sunday, March 26, 2017

पोल

किसी इंसान के आगे
ज़माने और ज़िन्दगी की
पोल खुल जाए
तो वो कैसे जियेगा!

वैसे ही जी
हंस हंस के
देख
करिश्मे
तमाशे।

Saturday, March 25, 2017

गठरी

आज भी
'गर
तेरे
वही सवाल हैं,

ऐ मुसाफ़िर ज़हीन,
तेरी गठरी के
बेकार
सभी जवाब हैं!

Friday, March 24, 2017

गोत्र

आपकी
कविताओं के
गोत्र की ही हैं
शायद
रचनायें मेरी,

सीरत मिलती है
बहुत कुछ,
तेवर भी
पहचाने से हैं!

कौए

कौओं से
पुकारते तो हैं
हर गली
रास्ते की
ईमारत
खम्बे
दीवार से,

आगन्तुकों
अतिथियों के
मगर
सादर सूचक नहीं,
बाज़ारों के बन्धुआ हैं
ये इश्तहार
छोटे बड़े...

Monday, March 13, 2017

दूसरा किनारा

8 घण्टे दी नींद
जिवें 5 कु मिनटाँ च लै के
मैं फ़्री सी!
मौत नालों ए डीप स्लीप
अलेहदा
ख़ौरे किवें सी?

होवेगी
बेशक़
इक दे उस पार
कोई नवीं दुनिया,
दूसरे दे किनारे वी ताँ
इक अनदेखी सवेर सी!

Saturday, March 11, 2017

व्यापार

एम बी ए!

व्यापार करेगा?

मुफ़्त में बेचेगा
क्रोध
या
मंहगे में देगा?

Friday, March 10, 2017

शुक्रिया

तेरे धोख़े का
शुक्रिया,

कीमती सबक
बहुत कम में मिला!

Monday, March 6, 2017

टिफ़न

चढ़ी दोपहर
स्कूल में
खोलते हैं जब
टिफ़न
बच्चे,
बंधा पाते हैं
फिर
सुकून की सुबह का
ताज़ा टुकड़ा,

माँ वालों
के नित में
सूरज कई बार है चढ़ता।

Saturday, March 4, 2017

आराम

लो यहाँ अपने सफ़र को
देता हूँ विराम,
थक कर चूर मगर बेहद ख़ुश
रूह को आराम देता हूँ,

कह देना ज़माने को
बड़ा शुक्रगुज़ार था मैं,
उसके हर मन्ज़र को
तहे दिल से सलाम करता हूँ,

था मैं अलबत्ता
किसी और मिट्टी का,
सो इस मिट्टी को वापस बा अदब
साज़ ओ सामान करता हूँ!

महफ़िल

हो
एक ऐसी भी महफ़िल
जहाँ
न शम्मा, न परवाना हो,

पिघल पिघल के
जले
मेरा ही वजूद,
तेरी ही रूह को
नज़ारा हो!

समन्दर

मोतियों के समन्दर में
रखना आँसू सम्भाल के,
खो जाओ जो किसी रोज़
तो इनमें ही मिलोगे!

Friday, March 3, 2017

क़ीमत

मत कर
ख़ुद को
लहू लुहान
गर इस कदर
आरज़ू है तेरी,

एक सबक और
सीख ले,
क़ीमत दे दे।

तौबा

एक बार
डस्वाकर
करूँ
सर्प से
तौबा,

न उसे
रहे मलाल
न मुझे रहे!

Thursday, March 2, 2017

क्राँति

क्राँति
को पता है
कि उसे
कब क्यों कहाँ
कैसे होना है,

बरस के होना है
या रिस के होना है!

अब तो

इन्सां,
अब तो
टाँगे काटने की सोच,

न तो
और चादर बढ़ाने की
कुव्वत है तेरी,
न पसारी तमन्नाओं
के सिमटने के इम्कानात।

Tuesday, February 28, 2017

शोध

स्वयं पर
शोध करवाने हेतु
कहाँ कहाँ
भटकते हैं
यतीम मजबूर विषय,

गुमराहों को
पुरानी सुखद पगडंडियों में हाँकने से
रहनुमाओं को
फ़ुर्सत नहीं!!!

शय

तेज़
ऐन्नी कोलों
लंगी
इक शय
के भम्बीरी बणा गई,

ऐने चिर बाद
अज वी
अक्सर
रेहन्दा घुमदा
आपणी धुरी ते मैं,
आ जावे
बस इक वार फेर
ते समजा जावे
कि की सी?
ते क्यों सी?

होर

गल्लाँ
ओही सी
पर
तासीर
स्वाद
कुज होर सी,

कैण नूँ
सिर्फ़
ज़बान सी
अलेहदा
पर असर ही
कुज होर सी!

Tuesday, February 21, 2017

क्या

हाटों से उठ
गलियों से चल
दरवाज़ों को खोल
डयोढ़ियों को लाँघ
आँखों कानों मस्तिष्क की
खिड़कियों से
वजूद के कमरों में आ,
समा गया है
बाज़ार
इन्सां की रूह में,

कोई बिकना न चाहे
तो क्या करे!

Monday, February 20, 2017

भँवर

तुझे आँकूँगा
वक़्त गुज़र जाने के बाद,
अभी
फंसा है तू
अपनी ही भंवर में
तेरा वक़्त थमा है।

हश्र

तुम्हीं नें इसका
ये हश्र कर दिया,

जिस्म में लिपटी
दी थी रूह,
रूह पर लपेटा
जिस्म कर दिया!

द्रोणा

अँगूठे की जगह
शब्दों की शमशीर भेंट की,
अर्जुन नें
एकलव्य का
यूँ
दर्द बयाँ किया!

Wednesday, February 15, 2017

ख़िलाफ़

बाज़ार
स्कूल
इबादतगाहों
रंगमंचों के
करीब देख लेते
कोई खाली जगह,

पास होते
अपनों के
तो उन्हें देखते रोज़
मन की आखों से,

रण्दोल के डरावने पीरुनाले में
शमशान बनाने के
ख़िलाफ़ थीं
रूहें भी!

चरित्र

सोचता हूँ काट दूँ उंगलियाँ
एक सी नहीं,
और ये बाज़ुयें
एक कहाँ, एक कहीं,

इन टाँगों का क्या करूँ
जाती है एक जो आगे तो दूसरी पीछे,
दो कान जो सुनते हैं एक ही बात
पर अपने सरीखे,

क्या करूँ इस देह का
जो इतनी विचित्र है,
कैसी होगी रूह
जिसका यह चरित्र है,

मस्तिष्क जब एक है तो विचार
इतने क्यों,
इतनी हैं सम्भावनायें
तो जीवन एक क्यों!

Saturday, February 11, 2017

गूगल मैप्स

ज़ूम कर करके देखता हूँ
उस शहर का गूगल मैप,

हो हो रोमाँचित
देख उभरती
धीरे धीरे
हर वो बिसरी सड़क
चिंगारी है जिसका नाम
मेरी यादों के बारूद को!

आँखें फाड़
चिपका हूँ
लैपटॉप स्क्रीन से,
शायद दिख जाए
और ज़ूम की गहराइयों में
वो गली
वो नुक्कड़
वो घर
वो घर के बाहर का चबूतरा,
उस चबूतरे पर बैठी
ख़्यालों में मेरी राह देखती
मेरी वही
मुस्कुराती
बूढ़ी
अमर नानी!

Tuesday, February 7, 2017

स्याल दी सवेर

कदे कदे
सूरज
दिने वी सौं जाँदा,
जदों बद्दलाँ दी बुक्कल नसीब हुन्दी,

विच विच झाक
किनारेयाँ चों
जिवें स्याल दी चढ़दी सवेर
माँ दी गोद च मस्तेया
जागदा, पर फेर वी नींदेया
जवाक कोई,
झट खिच
ताण लैंदा
आपणे चंगे नसीब दी खेसी,

कदे कदे
छड
नाशुक्रे ज़माने नूँ
यतीम,

सूरज
चड़नेयों रह जाँदा!

Monday, February 6, 2017

बीज

इतना डरा दोगे
अर्थ के बीज को
तो कैसे फूटेगा?

कैसे बनेगा
कल्पवृक्ष,
पाश टूटेगा...

तूफ़ान

रात के समन्दर में
विचारों की लहरों पर
सोच की नाव
जब घिर गई
बेचैनी के तूफ़ान में,

रौशनी की प्रार्थना में
डाला जो क़िताब का लंगर
लगा जैसे पालने में हूँ मैं,
लगा जैसे सुक़ून की नींद है आती!

Friday, February 3, 2017

मोमबत्ती

हवा के सीने से
लेकर
दो हाथ भर
ऑक्सीजन
उधार,
एक मोमबत्ती जला लूँ,

इस
सुनसान ऊँचाई पर
अकेले में
ख़्यालों की
महफ़िल
सजा लूँ!

Monday, January 30, 2017

कमाल

सूरज
चन्न
तारे
आसमान
ते क़ायनात
बणाणा किते असान सी?

फेर
तूँ
तेरे ख़्याल
तेरी अक्खाँ दे दृश्
किते छोटे सवाल सी?

तेरी
पिट्ठ तों
लाया सी
तेरी होंद दा भार,
इक रब्ब बणाया सी,

तूँ
अजे वी ऐं लोड़दा
आपणी पछाण!
तेरे वास्ते
सब सी कीता,
कोई छोटा कमाल सी!!!

Tuesday, January 24, 2017

हाल

पूछते हैं वो हाल
बताओ क्या बतायें!

काँटों में ग़ुलाब
कीचड़ में कमल की तरह,

मोहलत में वक़्त की
ज़िन्दगी चढ़ते शबाब पर है।

Saturday, January 21, 2017

समझदारियाँ

ख़ुश है
एक इंसां,
लिल्लाह!
रहने दे,

नादानियों की
बात ही क्या,
वो समझदारियाँ भी
रहने दे!

Wednesday, December 28, 2016

आरे

आपणी
तरजणी
ते अँगूठे नाल
कदी मेरे बुल्लाँ ते
हासा ताँ लेआ,

तजुर्बेयाँ
खत्तेयाँ
दी चपेडाँ दी थाँ,
आपणे पोले पोटे
मेरी सुक्कियाँ गल्लाँ नूँ ला
मेरे पिता परमेश्वर,
मेरे हँजू ताँ पुंज,
किसे आरे ताँ ला!

कहीं और

अब कहाँ
रातों रात
इंद्रधनुष
अपने रंग बदले,

आसमान से कहो
कि सूरज को कहे
कि बादलों से कहे
कि कहीं और
बरसें!

चलो

चलो चलकर
कोई ज़िन्दगी
बचायें,

ख़ून ए पाक़ से
खेलकर
नहायेंगे
कहाँ कहाँ!

कुछ और

खेलते हैं
नाती संग
आप
पर
खुश कुछ और तो होइए!

ये आप ही हैं
तैयार
जीने को
मरने के बाद!

एक अक्षर

फड़फड़ाती
पताकाओं वाले "है" से
इति के स्तम्भ वाला "था"!

एक अक्षर से भी क्षीण निकली
तेरी वजूद की गाथा।

Tuesday, December 27, 2016

सड़क

"आ जाओ माँ,कोई गाड़ी नहीं आ रही,सड़क क्रॉस कर सकते हैं!" -
नेत्रहीन माँ का दायाँ हाथ पकड़े
पाँच साल का बेटा बोला,

"हाँ, हाँ माँ कोई गाड़ी नहीं आ रही, भऊ भऊ!" -
माँ के बायें हाथ से रस्सी में बंधा
नन्हा मोती भी इधर उधर देखकर बोला...

Friday, December 23, 2016

पैग़ाम

भेजा है
पैग़ाम
देखें
कब मिले,

कब आये
जवाब
हमें कहाँ मिले!

Thursday, December 22, 2016

शुक्रिया

घिसे तो होंगे ज़रूर
तेरे ब्रेक पैड,
मोशन भी टूटा होगा,
एक आध मिनट की
हुई भी होगी देरी तुझे,
और बस पाँच एक रूपये का ही
हुआ फ़ायदा होगा,

पर
बहुत शुक्रिया तेरा
ओ विरल बस के ड्राइवर
रोकने और चढ़ाने का
सड़क किनारे खड़े उस इकलौते बच्चे को
पहुँच गया जो
आज भी
समय पर
गाँव से दूर
अपने स्कूल!

Wednesday, December 21, 2016

रूख़सत

बड़े
एहतमादो एहतराम से
हम
हुए
महफ़िल से रूख़सत,

वहीं रहे
फिर
ताउम्र
पर वहाँ न रहे।

शिकवा

सिरहानों से नहीं है
सपनों को
शिकवा,

नींद ही
उड़ी है
दुनिया की
मख़मल के
पत्थरों पर...

फिलहाल

हमें मालूम है
आपके
सच की सच्चाई,

फिलहाल
हैरान हैं
झूठ के दावे पर...

Sunday, November 13, 2016

किनारा

कितना दूर
आ गया
मैं
बहते बहते,

दरिया के बीच ही
किनारा हो गया।

Sunday, November 6, 2016

ज़रूरत

क्या है ज़रूरत
मन्दिरों गुरुद्वारों की
देहात में,
हर कहीं तो
मौजूद है
वो,

शहरों में
बनाओ
जहाँ
सिर्फ़ फ़्लैट हैं!

हिसाब

मॉलिक्यूल मॉलिक्यूल का
हिसाब देखा
क़िस्मत की उंगलियों वाले
ईश्वर के हाथों में,

हैरानगी से देखता हूँ
वो चावल
वो दाल के दाने
जो पहुँचे हैं मेरी थाल में
लंगर की पंक्ति में!

फ़ुर्सत

बेशक़
हूँ ज़िंदा,
पर पूरा
वर्तमान
न समझ,

एक बड़ा
हिस्सा हूँ
अपने इतिहास का
फ़ुर्सत में
पढ़ता।

धूप

उसकी
अदृश्य
कार पर तो नहीं,
उसके
किराये के मकान
की छत पर थी
एक
सन रूफ़,

सिर्फ़
सर और गर्दन ही नहीं,
पूरा वजूद
निकाल
बैठता था वो
परिवार सहित
इतवार की गुनगुनी धूप सेकने
हर सर्दियाँ।

Tuesday, November 1, 2016

सौरमण्डल

एक पूरा सौरमण्डल था
तिड़ तिड़ जलता
उस लौ में,

एक मैं
बाहर था
देखता,
एक सूक्ष्म
कहीं भीतर
तपता।

Monday, October 31, 2016

लैम्पपोस्ट

नस्लों
के फूलों
की डण्डियों से
हटाये जो भारी बस्ते
तो कुबड़े निकले,

सूरजमुखी
की कुदरत
के वारिस
समझदार
मजबूरियों के
लैम्पपोस्ट निकले।

Saturday, October 29, 2016

कमी

एक और एक
ग्यारह हुए
तो मुश्किलें
नौ दो ग्यारह हुईं,

उन्नीस बीस
कि कमी थी
इरादों में,
पूरी क्या हुई
कि पौ बारह हुई!

दुआ

दिली ख़्वाहिश है
ज़माने की
कि वहाँ पहुँचे
जहाँ जाता है!

कोई बदल दे
जहन्नुम को
जन्नत में
दुआ है मेरी!

हाज़िर

तेरे दर से
गर हूँ
ग़ैरहाज़िर
तो कहीं तो
हाज़िर हूँ,

तू भी तो
मुफ़लिसों के ख़ैरख़्वाह!
कभी
कहीं से हो ग़ैरहाज़िर
कहीं हाज़री दे!

लिहाज़

कपड़े पहन कर तो
नाचा कर
ऐ पैसे!

रस्मन
अभी भी है
सभ्य
ये समाज,
कुछ तो
लिहाज़ कर!

Friday, October 28, 2016

कौन

तुम्हारे
चेहरे के पीछे
ये कौन है?

बोलता है
तुम्हारी आवाज़ में,
ख़ुद मौन है!

Wednesday, October 26, 2016

दस्तक

जाने
कौन सा
अनिष्ट
मेरी दहलीज़ पर है,

दस्तक दी है
हराम नें
मेरी हथेली में
फिर आज।

Monday, October 24, 2016

सच

सच बता,
सच!
तू कितना सच है?

है झूठ के शहर में अकेला
या तेरे
कई सच हैं!

Sunday, October 23, 2016

देव

परम् आनंद है
अनभिज्ञता,

रोमांचित हैं
देव,
तभी
मानव हैं।

Saturday, October 22, 2016

तलाश

जब जब भी मैंने
पूछा उनसे
कि क्या
जानते हैं वो
शान्ति का रास्ता?
बता सकते हैं मुझे?

शरीफ़ाना सा मुँह बना
उन्होंने
हर बार
खोला
बाज़ार का रास्ता!

Friday, October 21, 2016

बोलचाल

दुनिया
तुझसे रूठने को
हूँ मैं,

हमारी बोलचाल
टूटने को है,

तेरा झूठ है अब
मलिन हो चुका,

मेरा सब्र भी
अब टूटने को है।