Friday, August 26, 2016

एम्बुलेंस

108 नहीं ताँ
4 पैराँ दी एम्बुलेंस ही सही
शमशान दे आख़िरी अस्पताल तइँ,

दो मेरे मोडे ते
दो क़िस्मत दे सीने,

ऐ वतन
मेरे देशवासियाँ नूँ
कुज ना कहीं!

Thursday, August 25, 2016

यक़ीन

कौन करेगा,
आईने!
तेरे इल्ज़ामों पे यक़ीन!

यहाँ हर कोई
संवारता है
मुखौटा
दीवारों के पीछे।

Wednesday, August 24, 2016

इम्तेहान

इम्तेहान लेकर
गुज़र गईं
घड़ियाँ,

घबराये
किनारे
उस पार
रह गए!

Monday, August 15, 2016

आज़ाद

चाहता तो है
पर चाहता नहीं है,

खुला है जब पिंजरा
क्यों आज़ाद नहीं है!

Friday, August 5, 2016

जन्म

कब्रों पे
लगा दिये
पेड़ हमने,

गर्भ के
कणों का
पुनः
जन्म हुआ।

आलोचना

आलोचना की निगाह से
तासीर छूट गयी,
देह हो गई छलनी
रूह छूट गयी।

प्रतिध्वनि

वो कविताएँ
जो लिखूँगा
उस पार
कितनी हसीन होंगी,

बिना काग़ज़
कलम
आवाज़
रूहों के खुले सभागार में
गूँजेगी उनकी
ख़ामोश प्रतिध्वनि,

जिस्मों की धरती
भले
तब भी
अनजान होगी।